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एक स्वर्ण कण खो जाने से , हो उठता उर कातर , कैसे धैर्य धरे वह जिनका खो जाये रत्नाकर

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◆ आचार्य देवेश राष्ट्रसंत श्रीमद विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी को दी नगर के समाज-संगठनों ने श्रद्धांजलि
गुरु गुणानुवाद गोष्ठी
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कुक्षी। श्रीमद विजय राजेन्द्र सुरीश्वर जी म.सा. के पाट परंपरा के षष्ठम पट्टधर पूज्य सम्राट आचार्य देवेश राष्ट्रसंत श्रीमद विजय जयंतसेन सुरीश्वर जी म.सा. के देवलोकगमन पर कुक्षी जैन श्री संघ द्वारा आयोजित गुणानुवाद गोष्ठी में नगर के विभिन्न समाज व संगठनों ने गुरुदेव के 1998 के कुक्षी चातुर्मास को उदघत करते हुए उनके व्यक्तित्व व कृतित्व का पुण्य स्मरण किया । राजेन्द्र जैन नवयुवक परिषद के रमेश जी धाड़ीवाल ने गुरूमहिमा का वर्णन करते हुए गुरु शब्द की विराटता को शब्दों की परिधि में बांधना असंभव बताया । ज्ञानेश्वर सोनी ने उनके व्यक्तित्व को अत्यंत उदार व चिंतनशील बताया । मनोज साधु ने उन्हें वाणी माधुर्य का कुशल शिल्पज्ञ बताते हुए ज्ञान सम्पदा का महासागर कहा । पं मनोहर मंडलोई ने कहा वे सामाजिक समरसता के संपोषक थे । एडवोकेट राजेन्द्र गुप्ता ने गुरुदेव को युगद्रष्टा बताया । श्री संघ के मनोहरलाल पुराणिक ने गुरुदेव के जीवन वृत पर प्रकाश डाला और कहा कि वे मानवीय मूल्यों और जीवन के सिद्धांतों पर चलने वाले जीवजगत का कल्याण करने वाले राष्ट्रसंत थे । नितिन पहाड़िया ने कहा कि गुरु स्मरण से मन और विचार पवित्र होते है । शारदा वाचनालय अध्यक्ष हरिश रेवड़ियां ने गुरुदेव को मानव समाज का मार्गदर्शन करने वाला परमात्म स्वरूप बताया । गोपाल सोनी ने कहा कि गुरु सभी बंधनो से मुक्त ओर ज्ञान सम्पदा से युक्त थे । बोहरा समाज के होजेफा दाउदी ने कहा कि गुरु की तुलना किसी अन्य से कदापि नही की जा सकती । नरेंद्र बामनिया ने कहा कि गुरु सत्कर्मो के सेतु से मानव जीवन को पार लगाते है । पुनम कसेरा ने गुरुदेव के निधन को समाज जीवन की अपूरणीय क्षति बताया । रूपेश बडजात्या ने गुरुदेव को वटवृक्ष की संज्ञा देते हुए स्वयं को घास-फूस निरूपित किया । गुणानुवाद गोष्ठी में डॉ.आनन्द पाटीदार, डॉ. घनश्याम मीणा, वीरेंद्र त्रिवेदी, ओ पी पाटीदार, पोरवाड़ समाज से राणाजी गुप्ता, पाटीदार समाज से महेश पाटीदार, महिमाराम पाटीदार, जैन विद्यालय से नरेश चौधरी, श्रीमती अमृता भावसार, सराफा एसोसिएसन से बंशीलाल बाड़मेर, आदि ने भी गुरुदेव के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक चेतना का दिव्यपुंज बताया । संचालन रविन्द्र जैन रूपम ने किया ।

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