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एहसास-5

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चंचला का स्वभाव अपनी माँ के प्रति सदैव ही बेरुखा रहा है। बचपन में ही माँ को बेटा ज्यादा प्यारा है, ये बात उसके मन में परिवार के वरिष्ठ सदस्यों ने बिठा दी थी। जिस घर विवाह हुआ, वँहा वो अकेली महिला होने वाली थी। सास की कमी ने भी उसके मन में माँ के प्रति कोई विशेष भाव नही आने दिया। वो अकेले भली प्रकार पूरा घर संभाल लेती। परिवार आगे बढ़े इसलिए ससुर जी ने छोटे बेटे के विवाह हेतु प्रयास प्रारम्भ किया। इसी बीच घर में नन्हा मेहमान आने की खबर आ गई और साथ ही उसके देवर का विवाह भी तय हो गया। होने वाली देवरानी से सामान्य बातचीत में चंचला ने पूछा “रागिनी तुम अभी से बता दो, मुँह दिखाई में क्या चाहिए?”आज के दौर की रागिनी तपाक से बोली “दीदी बस सप्ताह में एक-आध बार अपनी मम्मी से मिलने जाने का खुल्ला आशीर्वाद”, वैसे दीदी आप अपनी मम्मी के पास कितने दिन में जाती हो ? बात तो रोज ही होती होगी ? जैसे कई सवाल रागिनी ने भविष्य में अपने मायके से सम्बंधो की जीवंतता के लिए पूछ लिए। चंचला ने मुस्कुराते हुए कहा, अरे भाई तुम जितनी बार चाहो उतनी बार अपनी माँ के पास जाना हमे इसमें भला क्या समस्या होगी, आखिर वो तुम्हारी माँ है।

रात में चंचला के मन में आया “मैने सहजता से रागिनी को उसके मायके से जुड़े रहने के लिए कहा, लेकिन मै ? यह सवाल सुबह होते ही स्वतः समाप्त हो गया। दिनचर्या पहले कि ही तरह चल रही थी। देवर का विवाह हुआ, चंचला ने रागिनी को बिलकुल अपनी छोटी बहन जैसा प्यार दिया। रागिनी कई बार पूछती “दीदी आपका मायके जाने का मन नही होता क्या ? आपको कभी माँ से बात करते नही देखा, आंटी तो आपको बहुत प्यार करती है, सबसे आपके घर संभालने और रिश्तों को सहेजने के लिए तारिफ़ करते नही थकती।

बात करते-करते चंचला को असहनीय पीड़ा हुई, घर में कोई बड़ा नही था, सो रागिनी ने चंचला। की माँ को ही फोन करना उचित समझा। वह दौड़ी-दौड़ी रागिनी के साथ चंचला को अस्पताल ले गई। बच्चे के जन्म के समय पीड़ा के साथ-साथ, चंचला अपनी माँ को बार-बार पुकार रही थी। वो महसूस कर रही थी, की माँ ने भी तो उसे जन्म देने के लिए उस समय कितना सहा होगा और उस जमाने में बेटी जन्म के कारण कितने ताने भी सुने होंगे। ऑपरेशन थिएटर में चंचला के मन-मस्तिष्क पर अब केवल माँ थी। बार-बार वो यही सोच रही थी की उसकी माँ ने तो कभी उसमे और भाई में कोई भेद नही किया, हमेशा उसके भले के लिए घर से अकेले ही तो भीड़ जाती थी, उसे आगे पढ़ाने से लेकर उसे जीवन में आत्मनिर्भर बनाने के पीछे “माँ” ही तो है। आज जब चंचला स्वयं “माँ” बनी तब समझ पाई है उसे।

ये हे चंचला, जिसे आज “एहसास” है की माँ कभी बच्चों में भेदभाव नही कर सकती। उसने सबके कहने में आकर माँ का बहुत मन दुखाया है। अब वो अपनी माँ के लिए कुछ करना चाहती है, लेकिन “क्या माँ उसे अब स्वीकार करेगी”? आप भी सुझाव दीजिये चंचला अपनी माँ को उसके प्रति स्नेह, कैसे महसूस कराए ?

श्रीमती माला महेंद्र सिंह,
एम एस सी, एम बी ए, बी जे एम सी,
सामाजिक कार्यकर्ता,
94795555503
Vandematram0111@gmail.com

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