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चलते-चलते: आइये जीत जाएं, अपने आपसे…

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स्वदेश बहुत अच्छा वक्ता और स्क्रिप्ट राइटर है। विश्वविद्यालय के लिए सतत् कई वर्षो तक प्रतिनिधित्व करता रहा, महज छोटी उम्र में कई नाटकों की स्क्रिप्ट से उसने विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। जीवन में बड़ा लेखक बनना चाहता था। आज अचानक ही एक टेलीकम्यूनिकेशन कंपनी में मुलाकात हुई। मैने बड़े आश्चर्य से उसकी ओर देखा, क्योंकि वो वँहा दिखा जँहा हमे उम्मीद नही थी। उसकी बातो और उसके प्रयासों से लगता था, जल्द ही बहुत नाम कमाकर मुम्बई के किसी बड़े प्रोडक्शन हाउस के लिए काम करेगा। मै कुछ बोल पाती उसके पहले ही वो बोला “अरे दीदी आप यंहा ? बहुत सालो बाद मुलाकात हुई। मैने अभी-अभी यंहा ज्वाइन किया है। अचानक सब जमा जमाया काम खराब हो गया, सो यंहा आ गया।” अनुज होने के कारण मैने सहज कहा “अरे भाई राइटर साहब मुम्बई को छोड़ कर यंहा कैसे?” स्वदेश बोला “कुछ नही दीदी बस एक सपना देखा था वो अधूरा रह गया। मुम्बई में बहुत संघर्ष है, हम जैसे छोटे लोग वँहा नही रह सकते। हर मोड़ पर खींचतान और इंडस्ट्री में लोगो का विचित्र व्यवहार मुझे अंदर तक आहत कर गया। अब मुझे कोई राइटर-वाईटर नही बनना।”

एक पढ़ा-लिखा, समझदार, हुनरमंद लड़का ऐसी बाते कैसे कर सकता है? एक उम्र में सपने देखने के साथ-साथ उसे पूरा करने का जुनून ही किसी भी इंसान को उसके होने का एहसास कराता है। और यही तो जीवन है, बड़े सपनो को देखने और उन्हें साकार करने के साथ-साथ हमे संघर्ष के दौर के लिए भी तैयार रहना जरूरी है। सफलता का असली स्वाद तो बार-बार कई बार असफल होने के बाद भी लगातार डटे रहकर अपने सपनो के लिए सतत् प्रयासरत रहकर उसे प्राप्त करने में ही है।

स्वदेश के साथ ही आप सभी से अनुरोध है, जीवन में छोटे-बड़े कई अवरोध आते-जाते रहेंगे। लेकिन हम अगर अपने सपनो को मूर्त रूप देना चाहते है, तो हमे अपने सपनो से समझौता किये बिना हर परिस्थिति में अपने पुरे सामर्थ्य के साथ केवल एक ही धेय्य को लेकर सजगता से लगे रहना होगा, छोटे-मोटे अवरोधों के कारण अपना मार्ग मत बदलिये, अंतिम सत्य तो “जीत” ही है, ये हमारी अपनी लड़ाई है जो हमारे “सपनो और संकल्पशक्ति” के मध्य है, तो आइये जीत जाये अपने आपसे..

श्रीमती माला महेंद्र सिंह,
एम एस सी, एम बी ए, बी जे एम सी,
सामाजिक कार्यकर्ता,
94795-55503,
Vandematram0111@gmail.com

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