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आईये न कभी घर…

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-पी. श्रीवास्तव

आये दिनों चलते फिरते उनसे मुलाकात होती रहती। जब विदा होते तो कहते – आईये न कभी घर। मैं कहता -हाँ पक्का। न उनके निमन्त्रण में कशिश न मेरे स्वीकार्य में। कुछ शब्दों ने सच में अपने अर्थ ही खो दिए। “आईये न कभी घर” कहते वक़्त उस छोटे से जुमले में कई सारी भावनाएं गड्डमड्ड होकर छुपी होती हैं। वो बन्दा चाहता तो है कि आप को घर बुला कर, न सही खातिरदारी, पर, ढेर सारी बातें कर सके । मगर साथ ही उसके स्वरों के बोझिल और ठंडा होने के पीछे छुपी होती हैं उसकी विवशताएँ यथा- नौकरी व्यवसाय के चलते समय की उपलब्धता, सामाजिक जवाबदेही की व्यस्तताएं, पत्नी बच्चों का आपके आगमन पूर्व तैयारियों में सहयोग अथवा असहयोगपूर्ण रवैया, आपके आगमन पर छूट जाने वाले टीवी सीरियल और कभी कभी आर्थिक मजबूरियां।

अब जो हालात मेज़बान के हैं कमोबेश वही हालात मेहमान के भी होते हैं। लिहाज़ा वो भी “पक्का” कह के इतिश्री कर लेता है। जितने भी पाठक इस सन्देश को पढ़ रहे हैं, मैं यकीन से कह सकता हूँ, कि, किसी के घर जाने और किसी को घर बुलाने के लिए सभी तरसते होंगे। मन करता होगा। लेकिन बच्चन जी के शब्दों में कहूँ कि “जीवन की आपाधापी में” हम एक बहुत आसान एक बहुत सस्ते और एक बहुत सुलभ आनंद से महरूम हैं। चलो छोडो यार ये टीवी ये मोबाइल। चलो किसी पुलिया पर दोस्तों से ठिलवाइ करें ,किसी नदी के पानी पर दूर तक पत्थर फेंकने की पुरस्कार रहित प्रतियोगिता करें। और थक जाएँ तो किसी दोस्त के घर पानी पीने चलें। न मन में किसी नाश्ते चाय की औपचारिकता रहे , न उसके घर के सोफे कुशन परदों पर आलोचनात्मक दृष्टि। बस निर्मल आनन्द, प्रफुल्लित मन और मधुर प्यारे रिश्ते।” कभी आईये न घर “जैसा नीरस बुलावा न हो और न ही “पक्का “जैसा कोई कच्चा वादा।

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