Home इंदौर “दहशतगर्दो सावधान… टाइगर अभी जिंदा है”

“दहशतगर्दो सावधान… टाइगर अभी जिंदा है”

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माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के अधिकारियों/ प्राधिकारियो के कार्यो की जितनी सराहना व प्रसंशा की जाए, उतनी कम है, अनियमितता अवैधता मनमानी का बोलबाला है। भारत के किसी अन्य राज्य के उच्च न्यायालय में ऐसी अनियमितताए, मनमानी, अवैधानिकताये, व निरंकुश तरिके से कार्य करने की प्रणाली देखने को नही मिलेगी। वर्तमान में मध्यप्रदेश न्यायपालिका कतिपय वर्गो व लोगो की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जिसका आने वाले कुछ ही दिनों में भविष्य में निजीकरण होने वाला है, तथा निजीकरण की और अग्रसर है। एक उदाहरण आपके सामने रखना चाहूंगा शायद केंद्र, राज्य व अन्य निकायों में कुछ उच्च पदों पर विराजमान अधिकारियों / कर्मचारियों को यह अच्छी तरह ज्ञात होगा कि यदि किसी कर्मचारी/ अधिकारी को पदोन्नत करना हो, अनिवार्य सेवा निवृत्त करना हो या किसी प्रकार से अन्य कोई कार्यवाही संबंधित के विरुद्ध करना है तो उसकी विगत वर्षों की गोपनीय चरित्रवालियो को विचार में लेकर कार्यवाही की जाती है, वह भी कोन सी वार्षिक गोपनीय चरित्रावली जो अंतिम हो चुकी हो, v
विचाराधीन नही होना चाहिए, यदि कोई वार्षिक गोपनीय चरित्रावली अंतिम नही हुई या उसके निराकरण के संबंध में अभ्यावेदन लंबित हो तो उसे छोड़कर पूर्व की ACR पर विचार कर कार्यवाही की जावेगी, किन्तु लंबित वार्षिक गोपनीय चरित्रावली पर विचार नही किया जावेगा। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के अधिकारियों/ प्राधिकारियों के द्वारा किये गए कार्यो पर हंसी आवेगी की वर्ष 2016 की ACR साशय माननीय जिला जज आदरणीय सम्मानीय पूजनीय श्री के.के.त्रिपाठी द्वारा साशय विपरीत टीप उच्च अधिकारियों के प्रभाव व दवाब में लिखी गई, जिनके दवाब में लिखी गई उन्हें अंतर्मन से विदित व अच्छी तरह से ज्ञात है, जिसको मेरे द्वारा आक्षेपित भी किया गया तथा उस संबंध में विपरीत टीप को अपास्त करने के संबंध में अभ्यावेदन माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष वर्तमान में अभी भी आज दिनांक तक लंबित है, व उसका लगभग 1 वर्ष पूर्ण हो जाने के बाद भी अंतिम निराकरण नही किया गया तथा उसे विचार में लेते हुए व उसे मान्य करते हुए अनिवार्य सेवा निवृति का आदेश पारित कर दिया गया, जय हो मध्य्प्रदेश न्यायपालिका व जय हो मुख्य न्यायाधिपति महोदय आदरणीय सम्मानीय श्री हेमंत गुप्ता जी की, जो लोगो व समाज को तथा अन्य शासकीय विभागों को नियमो के संबंध में सख्ती से पालन करने की सीख व निर्देश /आदेश देते हैै, तथा उल्लंघन करने पर दंडित भी किया जाता है, किन्तु जब बात अपने ऊपर नियम पालन की आती है, तो नियमो को ताख में रख देते है उन्ही के द्वारा निर्मित नियमो का चाहे स्थांतरण का, चाहे नियुक्तियों का, चाहे 3 संतान के संबंध, चाहे किन्ही अन्य नियमो का सरासर उल्लंघन, क्या होगा इस देश का, जो लोग न्याय के सिंघासन पर बैठकर न्यापालिका की दुहाई देते है, व इस देश की जनता आँख मूंदकर उन पर विश्वास करती है, और करना भी चहिए जो आप अच्छी तरह से समझ सकते है….……………? किन्तु जनता को इस पक्षपात के बारे में शायद मालूम नही पड़ पाता, अन्यथा क्या स्थिति निर्मित होगी। नियमों के पालन में स्पस्ट भेदभाव बताना नही है स्पस्ट व सतत रूप से दिखाई दे रहा है, बताने की भी आवश्यकता नही है। न्यायपालिका में ACR लिखने के नियम भी विचित्र है, यदि अभ्यर्थी 100 में से 100 अंक लेकर आ जावे और उसका कार्य उच्च न्यायालय के मापदंड अनुसार उत्तम कोटि का है, और जिला जज किसी अन्य कारण से नाराज भी है तो प्रसाद पर्यन्त का सिद्धांत लागू होकर आपके कार्य की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कोई महत्ता व मूल्य नही है, और उसके बावजूद जिला जज उसमे fail अंकित कर दे उसे Fail ही माना जावेगा, उस पर portfolio judge व चीफ जस्टिस महोदय भी उसके संबंध में निर्णय लेने में एक तरह से असमर्थ व असहाय है, या फिर अन्य कोई सोर्स हो। इस तरह की चुतियापंथी भारत के किसी अन्य विभाग में नही है। न्यायपालिका में ACR मनमाने व जानबूझकर परेशान करने के आशय से लिखे जाने की प्रवृत्ति व प्रकृति है, जिसके संबंध में भी कार्य के आधार पर लिखे जाने व नियमो में परिवर्तन किये जाने बाबत अभ्यावेदन का निराकरण होना अभी तक शेष है।
इस तरह अनियमितता व अवेधानिकता पूर्ण, मनमानी कार्यवाही क्या उचित व किसी भी दृस्टि से तर्कसंगत, न्यायसंगत व युक्तियुक्त है, सत्य कड़वा होता है बर्दाश्त करने की क्षमता बहुत कम लोगो मे होती है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के अधिकारियों / व प्राधिकारियों में तो बिल्कुल नही।
अभी भी क्या किसी अन्य साक्ष्य की आवश्यकता है? आदरणीय माननीय हेमन्त गुप्ता जी जिन बिन्दुओ के संबंध में मेरे द्वारा ठोस एवम पुख्ता आधारों पर शिकायते की गई है उनकी जांच करने का अदम्य साहस जुटाए व जांच प्रारम्भ करवाएं, आप मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के बाहुबली मुख्य न्यायाधिपति महोदय होकर राज्य में सर्वशक्तिमान होकर अपार शक्तिया है, अन्यथा यह सार्वजनिक रूप से यथार्थ को स्वीकार करे कि उक्त शिकायते सही है, किन्तु आपमे इस बात का साहस व हिम्मत नही कीे आप जांच करवाकर दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही कर सके, आप तो सत्य का गला घोंटकर उसे फांसी पर लटकाने का प्रयास कर रहे, किन्तु स्मरण रहे सत्य अमर व अटल होता है व सत्य का कोई विकल्प नही होता है, जैसे कि राम नाम सत्य है।
“दहशतगर्दो सावधान टाइगर अभी जिंदा है”
आर.के.श्रीवास
जबरन सेवा निवृत्त अपर जिला न्यायाधीश नीमच

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