Home इंदौर “प्रमुख उद्देश्य बदला लेना नही, बदलाव लाना है”

“प्रमुख उद्देश्य बदला लेना नही, बदलाव लाना है”

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भारतीय संविधान के तहत स्थापित मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में पीठासीन अधिकारियो/ प्राधिकारियों द्वारा मनमाने रूप से, पद व विवेकाधिकार का दुरुपयोग करनेवाले लोगो को पदोन्नतिया प्रदान की जाती है व उन्हें रिटायरमेंट के पश्चात अच्छे पदों पर बैठाया जाता है, मेरी किसी व्यक्ति विशेष से कोई व्यक्तिगत वैमनस्यता अथवा मतभेद नही है, ओर न ही मेरा आशय बदला लेना है, बल्कि व्यस्था में मात्र बदलाव लाना है। मध्यप्रदेश न्यायपालिका में ऐसे अधिकारियों/ प्राधिकारियों के मजे है, जो जितना नियमों का उल्लंघन करेगा, नियमो के विरुद्ध कार्य करेगा पद व विवेकाधिकार का खुला दुरुपयोग करेगा उसके रास्ते और अधिक खुल जाते है, मेरा आशय मात्र उन खामियों व न्याय व्यस्था में व्याप्त कमियों को उजागर करना है जो जानबूझकर साशय की जाती है, व की जा रही है, व उन समस्याओं व कार्यो से किसी न्यायाधीश के अधिकार प्रभावित होने व ध्यान आकर्षित कराये जाने पर गाँठ बांधकर व लामबंद होकर उसे प्रताणित व परेशान किया जाकर नोकरी से बाहर किया जाता है। में मात्र अभी 7 अधिकारियों/ प्राधिकारियों के नाम उजागर कर रहा हु, यदि उनके द्वारा वर्णित कार्यो को कोई गलत सिद्ध कर दे तो मुझे दोषी मानते हुए कार्यवाही प्रारंभ कर दी जावे:-
1- श्री हेमंत गुप्ता माननीय मुख्य न्यायाधिपति महोदय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय जिनके व प्रशासनिक समिति की रिपोर्ट पर अनिवार्य सेवा निर्वति प्रदान की गई, क्या स्वय पर आक्षेपित आरोपो पर ध्यान देंगे, करोड़ों रूपए की मनीलांड्रिंग की जांच विगत लगभग 3-4 वर्षो से चल रही, जांच पूरी क्यो नही हो पा रही है। एक तरह से आप मध्यप्रदेश के लिए न्याय के देवता है, इतना गंभीर आरोप होने के बावजूद भी आप न्याय कर रहे है, क्या पद पर रहते निष्पक्ष जांच संभव है, मुझे ऐसा लगता है कि एक नेता पर आरोप लगने पर जांच होने तक वह नैतिकता के आधार पर वह अपने पद से त्यागपत्र दे देता है, आपको भी नैतिकता का धर्म निभाना चाहिये। आपके द्वारा जिस उच्च न्यायालय में पद को सुशोभित करते हुए कार्य किया गया वंहा के लगभग 1000 अधिवक्ताओ द्वारा आपके कार्यो से व्यथित होकर विधि मंत्री महोदय, राष्ट्रपति महोदय, माननीय मुख्य न्यायाधिपति महोदय ने दिल्ली व कई अन्य अधिकारियों को आपके विरुद्ध महाभियोग चलाने के संबंध में लिखा गया, उसके बावजूद भी आप पद पर निरंतर कार्यशील होकर विराजमान है, आपके द्वारा मेरे विरुद्ध विभागीय जांच विचाराधीन होने के आधार पर किस तरह अनिवार्य सेवा निवृत्ति का प्रस्ताव पारित कर शासन को भिजवाया गया, कार्यवाही व जांच आपके विरुद्ध भी लंबित है, मेरे विरुद्ध कोई मनीलांड्रिंग की जांच जारी नही है, किसी अधिवक्ता की कोई शिकायत नही, फिर कोन सा लोकहीत था या फिर व्यक्तिगत हित या कोई अन्य कारण, स्पस्ट कीजिये। भारत देश का स्वतंत्र नागरिक होने के नाते आपसे जवाब चाहता हु, क्या न्यायपालिका न्याय का मंदिर किसी व्यक्ति विशेष की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है जो मनमाने रूप से संचालित की जावेगी। स्वयं अपने लिए अलग कानून दुसरो के लिए अलग कानून। आपके समान मेरे विरुद्ध भी जांच लंबित है, दोहरा रवैया आखिर क्यों, समानता का अधिकार कहा गया, principal of parity का सिद्धांत कहाँ चला गया। मुख्य न्यायाधिपति महोदय आपको तो माननीय उच्चतम न्यायालय के सभी निर्णयो का ज्ञान होगा, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 12/01/2017 को सिविल अपील क्रमांक 8665/ 2017 हाई कोर्ट ऑफ़ जुडिकैचर एट पटना विरुद्ध अजय कुमार श्रीवास्तव में स्पस्ट कहा गया कि If the officer whose conduct is questionable warranting his removal or compulsory retirement from the service, such an officer cannot simply be sent home with all the retrial benefits. यह भी एक जज के प्रकरण में कुछ समय पूर्व कहा गया, या तो आप सभी साहबान निर्णय की अवमानना जानबूझकर कर रहे है, या अपना जिद्दी रवैया अपनाये हुए हैं, या फिर सरल शब्दों में कहा जाए कि आप सभी लोगो को कानून का ज्ञान नही है, या फिर अपने ज्ञान में इतने धर्मांध हो गए कि न्याय के हित में आप सभी लोगो को कुछ दिखाई नही दे रहा है या देखना व समझना नही चाहते है।
2- श्री वेद प्रकाश जी तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान उच्च्तम न्यायालय के निर्णयो का उल्लेख करते हुए नोटशीट लिखकर माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय वर्ष 2008 व 2013 की खुली अवमानना की गई, क्या यह उपेक्षा पूर्ण व मनमाने रूप से कार्य करने का उदाहरण पर्याप्त नही है, अपने कार्य काल के दौरान अपर जिला न्यायाधीश के पद उपेक्षा पूर्ण तरीके से निकाले गए व परीक्षा आयोजित की गई। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद स्वयं नोटशीट लिखी गई कि पद रिक्त नही है, इस संबंध में व्हिसिल ब्लोवर्स प्रोटेक्शन एक्ट के तहत 11 माह पूर्व शिकायत की गई , किन्तु उसकी जांच तक माननीय उच्च न्यायालय नही करवा रहा है, और शिकायत को लंबित रखकर दोषियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, शिकायत गलत है तो मेरे विरुद्ध कार्यवाही करें। ईतनी गम्भीर व घोर लापरवाही इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठने के बावजूद करना गंभीर कदाचरण नही है, किन्तु कार्यवाही कर सजा छोटे लोगो को ही दी जाती है, बड़े लोगो को बचाया जाता है। पद पर रहते प्राप्त अभ्यावेदन पर कार्यवाही न कर कई माहो तक अभ्यावेदनों को लंबित रखा जाना क्या घोर व गंभीर कदाचरण नही है, क्या इस संबंध में कार्यवाही नही होना चाहिए किन्तु नही। ऐसे लोगो को रिटायरमेंट के बाद विशेष रूप से उपकृत कर विधि आयोग का अध्यक्ष बनाया जाकर पद को शुशोभित किया जाता है, जिन्होने अपने कार्यकाल में पद व विवेकाधिकार दुरुपयोग तथा नियमो का उल्लंघन करते हुए, उपेक्षा व लापरवाही से कार्य किया है।
3- श्री मनोहर ममतानी तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान स्थानांतरण पालिसी 2016 का खुलमखुला उल्लंघन करते हुए स्थांतरण किये गए व शिकायत किये जाने पर उनकी कोई जांच माननीय उच्च न्यायालय द्वारा नही करवाई गई, यदि जांच होती तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता, यही नही स्वय उनके द्वारा लिखी गई नोटशीट अनुसार जिस जगह अपर जिला न्यायाधीश के पद रिक्त व उपलब्ध नही थे, उस स्थान पर पदस्थापना की गई, व शासन को हानि पहुचाई गई, जब न्यायाधीश की आवश्यकता उस स्थान पर नही थी, तो उसे वहां पदस्थ कर उसे कृतार्थ किया जाकर क्या पद का दुरूपयोग नही किया गया। उनके कार्यकाल के दौरान भी माननीय उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयो का सरासर उल्लंघन कर अवमानना की गई, जबकि उनका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया गया व अभ्यावेदन लंबित थे, किन्तु कोई कार्यवाही नही की गई। परिणाम पद व विवेकाधिकार का दुरुपयोग करने वालो को मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग में सदस्य बनाया जाकर उपकृत किया गया।
4- श्री फहीम अनवर रजिस्ट्रार जनरल महोदय के कार्यकाल के दौरान नियमो व स्थांतरण पालिसी का उल्लंघन किया गया, मनमाने रूप से न्यायाधीशों को स्थान्तरित किया गया। इसी तरह माननीय उच्च्तम न्यायालय के निर्णयो की और ध्यान आकर्षित कराये जाने के बावजूद उनका पालन नही कराया जाकर अवमानना की गई। पदग्रहण काल की अवधि के संबंध में भी बिना सोचे समझे व विचार किये बिना गलत आदेश पारित किया गया, जबकि उक्त नोटशीट को अंतिम रूप माननीय प्रशासनिक न्यायाधिपति महोदय श्री संजय यादव साहेब द्वारा दिया गया, उनके द्वारा भी मात्र हस्ताक्षर कर चिड़िया बैठा दी गई, यदि अधिनस्त न्यायालय का न्यायाधीश ऐसी गलती कर देता तो उसकी विभागीय जांच प्रारम्भ कर दंडित किया जाता, किन्तु कहावत है कि समरथ को नही दोष गोसाई, किन्तु उक्त बात राजतंत्र की है वर्तमान में प्रजातंत्र है, हर व्यक्ति अपने कार्य के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी है। बाद में अभ्यावेदन प्रस्तुत किये जाने पर आदेश में संशोधन किया जाकर विधि अनुसार आदेश पारित किया गया, क्या गलत आदेश होने पर अपनी बात कहने का अधिकार प्रजातन्त्र में विलुपत हो गया है। मेरा आशय वरिष्ठ अधिकारियो की गलती निकलना नही बल्कि मेरे अधिकार प्रभावित होने व बताये जाने पर उनके द्वारा दुर्भावनापूर्वक कार्यवाही प्रारंभ की जाती थी।
5- श्री शैलेन्द्र शुक्ला साहेब द्वारा भी वर्ष 2014 में माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा जारी दिशा निर्देश व माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के द्वारा जारी परिपत्र के उल्लंघन में नोटशीट लिखकर अनावश्यक चेतावनी जारी की गई नोटशीट में त्रुटि माननीय जिला जज महोदय की पाई गई व बिना सुने शिकायत कर्ता के विरुद्ध पद व विवेकाधिकार का खुला व मनमाने रूप से दुरूपयोग करते हुए चेतावनी जारी की गई, इस संबंध में व्हिसिल ब्लोवर्स प्रोटेक्शन एक्ट के तहत शिकायत जुलाई 2017 में किये जाने पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें बचाने के लिए शिकायत पर 11 माह बीत जाने के बावजूद जांच तक नही की जा रही है, व अभ्यावेदन अभी भी लंबित है, ऐसे लोगो के विरुद्ध कार्यवाही क्यो नही क्योकि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा गलत कार्य करने वालो को प्रश्रय दिया जाकर उनको बचाया जाता है, सही बोलने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाती है।
6- श्री सतेंद्र सिंह जी जिनके द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष दिनांक 31/01/2011 को मालिक मजहर सुल्तान के प्रकरण में झूठा शपथपत्र पेश किया गया जिसका पालन मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा पूर्ण रूप से उसका पालन नही किया गया, व शपथपत्र के उल्लंघन में जजो की भर्तियां 2011 के पश्चात से की जा रही है, किन्तु कोई कार्यवाही नही।
7- श्री के.के.त्रिपाठी तत्कालीन जिला न्यायाधीश जबालपुर के संबंध में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की अनियमित व मनमानी भर्ती के संबंध में शिकायत की गई थी, किन्तु आज तक कोई जांच नही की गई, इससे स्पस्ट है कि माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश भी इसमे अलिप्त है, इतनी गम्भीर शिकायत में कोई जांच नही, यदि किसी न्यायाधीश के विरुद्ध बिना शपथपत्र की गुमनाम शिकायत भी प्राप्त होती है, तो उस पर कार्यवाही प्रारंभ कर दी जाती है, किन्तु इन मामलों में कार्यवाही नही करना क्या इंगित करता है, आप खुद समझदार है…………….।
उपरोक्त्त गंभीर कदाचरण में कोई कार्यवाही व जांच नही करना, मेरे को उपरोक्त लोगो द्वारा प्रताड़ित व परेशान किया गया, जिससे मेरे द्वारा मीडिया का सहारा लिया गया तो मुझे मामूली कदाचरण के लिए अनिवार्य सेवानिवृत्त करना यह कहा कि न्याय। सुप्रीम कोर्ट के 4 न्यायाधीशों द्वारा भी प्रेस कांफ्रेंस की गई थी, उनके विरुद्ध यदि में गलत हु तो वो कैसे सही है। मेरे द्वारा नामजद शिकायत करने के बावजूद जांच नही करना यही इंगित करता है कि की गई शिकायते सही व निराधार नही है, यदि शिकायते गलत होती तो मेरे विरुद्ध कार्यवाही की जाती, यदि उक्त कृत्यों की जांच करने पर दोषी पाया जाता तो भी कार्यवाही को सही कहा जा सकता था, किन्तु एकतरफा कार्यवाही करना न्याय व्यस्था में बहुत अधिक मात्रा में दोष है।
वैसे भी न्यायपालिका में देखा गया है कि प्रायः सामान्य वर्ग के आरक्षित वर्ग के व अल्पसंख्यक वर्ग के न्यायाधीशों में स्पस्ट व खुले रूप से भेदभाव किया जा रहा है, चाहे भ्रस्टाचार के संबंध, चाहे किसी अन्य विभागीय कदाचरण के संबंध में हो, चाहे स्थांतरण के संबंध में, चाहे वार्षिक गोपनिय चरित्रावली लिखे जाने के संबंध में हो, प्रत्येक स्तर पर भेदभाव किया जा रहा है, सामान्य वर्ग के लोगो द्वारा कदाचरण व भ्रस्टाचार करने पर उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नही या मात्र टोकन कार्यवाही की जाती है। जिन सामान्य वर्ग लोगो के विरुद्ध भ्रस्टाचार व कदाचरण की विभागीय व प्राम्भिक जांच प्रमाणित पाई गई उनको पदोन्नत किया गया व उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नही। यह भी विगत वर्षों में सुना है कि न्यायपालिका में सब गलतिया माफ् है, किन्तु भ्रस्टाचार करने वालो को कतई माफी नही, किन्तु उक्त कई मामलों में भ्रस्टाचार के संबंध में विभागीय जांच प्रमाणित होने के बावजूद भी उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही न करना शंका की परिधि में पक्षपात पूर्ण रवैया है, जिस पर न्यायपालिका में अपार चिंतन, मनन व आत्मावलोकन की आवश्यकता है। आप यह विचार कर सोच रहे होंगे कि में उक्त तथ्य इस कारण प्रकट कर हु की मुझे अनिवार्य सेवा निवृत्त कर दिया गया इस कारण संस्था की छवि को खराब करने व प्रतिशोध की भावना से प्रकट कर रहा हु, यह बिल्कुल गलत व भ्रामक है , वास्तविकता में उक्त तथ्य बिना आधार के यह नही लिख रहा हु, इस संबंध में कई ज्वलंत उदाहरण मेरे पास उपलब्ध है। भारतीय सविंधान के अनुच्छेद 14 में स्पस्ट कहा गया कि सभी के साथ समानता का व्यवहार किया जावेगा, जब न्यायपालिका में असमानता की जा रही है, तो……………..क्या होगा इस देश मे । बात सामाजिक समानता की की जाती है, की प्रथम पंक्ति में खड़े व अंतिम पंक्ति में खड़े सभी लोगो से समान व्यवहार किया जावेगा, सामाजिक धार्मिक व वर्ण व्यस्था के आधार पर भेदभाव नही किया जावेगा, जबकि असमानता सबसे अधिक इसी संस्था में की जा रही है, व मुह देखकर तिलक लगाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
आ.के.श्रीवास
जबरन अनिवार्य सेवा निवृत्त न्यायाधीश नीमच

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