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नोटबंदी ; मूर्खता पूर्ण निर्णय का एक वर्ष पूर्ण, फिर भी जुमलेबाज “काला धन विरोधी दिवस” मनाकर देश को चिड़ा रहा : न काला धन आया, न आतंकवाद रुका, सिर्फ जीडीपी घटी और विकास का पहिया जरूर रुका “तमाशा विदेश में छुपे काले धन का किया था ; स्विस बैंक से काला धन लाने वाले नाम भी क्यों न बता पा रहे”

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✍🏽सोमेश्वर पाटीदार-प्रधान संपादक👁
*📞9589123578*

*✒खड़ी कलम…*
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*मित्रों…* भाइयों-बहनों के पीछे छुपे सत्ता के लालची सौदागर की भाषा व चेहरा उजागर हो चुका है, जिसे आमजनों को आईना दिखाना होगा। 8 नवम्बर 2016 को एक वर्ष पूर्व रात्रि में अचानक देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- मित्रों…/ भाइयों- बहनों… 1 हजार व 5 सौ का नोट बंद ! जिसके बाद जनता को बैंक में जमा/निकाशी के लिए लगातार लाईन में लगना पड़ा। इस दौरान कई घटनाएं भी घटी, बताया जा रहा नोटबन्दी के कारण लगभग 150 लोगों की जाने चली गई।

वही सरकार में बैठे लोगों द्वारा इस नोटबंदी को काले धन से निजात दिलाने व आतंकवाद की फंडिंग पर रोक से आतंकवाद कम होने के तर्क जनता को परोसे गए थे। इससे कई धंधेबाजों के पास जमा काली कमाई भी बाहर आने की चर्चा होती रही। जुमले बाजो व अंधभक़्तों ने इसे देशभक्ति से जोड़कर बताया, और जो इसका विरोध करें उसे देशद्रोही तक करार दिया।

कई अर्थशास्त्रियों ने नोटबन्दी को गलत बताया। जिसमें अर्थशास्त्री व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तत्कालीन स्थिति में ही कहा कि, 2% विकास दर घट जाएगी। जिसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा। लेकिन तब इनका मजाक उड़ाते हुए सत्ताधारी लोगो ने हवा हवाई कर दी। क्योंकि इनके पास बाबा रामदेव, अनुपम खैर जैसे चाटुकार बड़े-बड़े अर्थशास्त्री जो थे।

अब गले-गले तक आई और नकारात्मक परिणाम दिखने लगे, विकास दर में भारी गिरावट आई और धंधे चौपट होने लगे, तो सत्ता पक्ष के ही कई यशवंत सिन्हा (पूर्व वित्तमंत्री) जैसे नेताओं ने नोटबन्दी को गलत बताते हुए कई गम्भीर सवाल खड़े किए। लेकिन सत्ता के नशे में चूर हरल्ले वित्तमंत्री केटली जैसे लोग इनका भी मजाक उड़ाने से नही चुके। खुद की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए नए-नए जुमलो की प्रस्तुति देकर जनता को देशभक्ति का नगमा सुनाते रहे।

सवाल यह भी है कि, विपक्ष में रहते हुए गलाफाड़ चिल्लाते हुए विदेश में छुपे काले धन को वापस लाने की बात व सूचि जारी करने की नोटंकी करते रहते थे। अब खुद सत्ता में हो फिर विदेश से एक रुयया भी कालाधन के नाम पर लाये क्या ? बात विदेशी कालेधन की थी, लेकिन नोटबन्दी कर कालेधन के नाम पर जनता पर यह कहर क्यों बरपाया ? आतंकी घटनाओं पर लगाम लगने के बजाय, दिनोंदिन क्यों अप्रिय खबरें आ रही ? बड़े नोटों से काली कमाई दबाई जाने की चर्चा करते हो, फिर 2 हजार का नया नोट क्यों निकाला ?

तब मोदी ने देश की जनता से 50 दिन मांगे थे व्यवस्था के सुधार के लिए, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी हालत अनुकूल नही दिखाई दे रहे। अर्थशास्त्रीगण अब भी नोटबन्दी को गलत ही बता रहे। फिर भी नोटबन्दी करके व्यापार – व्यवसाय ठप व बेरोजगार करने वाले “कालाधन विरोधी दिवस” मनाने का संदेश दे, तो इससे साबित होता है कि, पहले फेंकू बन गए प्रधान सेवक!

इतना ही नही नोटबन्दी के जख्म भरे भी नही थे कि, कैशलेस की और कदम बढ़ाने चले व जीएसटी लगा कर दूसरी चोट दे दी। कल तक विपक्ष में रहते जिनका विरोध कर रहे थे, उसी को जटिल बनाकर खुद जनता को थोप रहे। सच मे मेरा देश बदल रहा है। क्योंकि, अब अन्ना हजारे भी कहीं सो रहा है और बाबा रामदेव भी बड़ा उद्योगपति बन गया है। सरकार की कु-नीतियों का विरोध करो तो देशद्रोही और चाटुकारिता करो तो देशभक्ति बताया जाता है।

लोकतंत्र में भी सत्ता पक्ष में बैठे लोग गलत नीतियों का विरोध करने से डरते है क्योंकि, साहेब कहीं निपटा न दे। इसीलिए फरमान है कि, “कालाधन विरोधी दिवस” मनाएंगे। जिसका पालन कई पीड़ित तो न चाहकर भी करेंगे और कई भक्ति में अंधे है, जो देर-सवेर मोदियाबिंद से मुक्त होंगे ऐसी उम्मीद है…

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