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कपटी सरकार के तानाशाही मंसूबो को अंजाम देने पर बाटें जा रहे खोखले पुरस्कार : डूब प्रभावित क्षेत्रों में जस की तस समस्याओं का साम्राज्य, पीड़ितों की आवाज़ दबाकर खुद की पीठ थपथपा रही सरकार _*_ जुमलेबाज मोदी व नोटंकीबाज शिव की कु-नीतियों से करोड़ों की बर्बादी कर भी आदर्श पुनर्वास नही “फुर्सत मिले तो पुनर्वास में हुए भृष्टाचार व अनियमितता पर भी कार्यवाही करके दिखाओगे या बंद लिफाफे से जांच पहुचेगी ?”

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✍🏽सोमेश्वर पाटीदार-प्रधान संपादक👁
*📞9589123578*

*✒खड़ी कलम…*
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*गज़ब…* नैतिकताविहीन सरकार की कु-नीतियों को अंजाम देने में लगे रहे शासकीय सेवकों को रेवड़ियों की तरह सम्मान-पत्र व स्मृति चिन्ह देकर पुरष्कृत किया जा रहा।निश्चित रूप से सरदार सरोवर परियोजना अंतर्गत डूब क्षेत्र में इनके द्वारा कार्य किया तो गया। परन्तु सरकार के दबाव में भरपूर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ाने में भी कोई कसर नही छोड़ी।

आदर्श पुनर्वास सरकारी कागजों व विज्ञापन में तो शासन-प्रशासन ने बहुत दिखाया था। परंतु जमीनी हकीकत कुछ और ही पोल खोलती रही दगाबाज सरकार की। डूब प्रभावितों की न्याय की आवाज़ को बुलंद करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के नेतृत्व वाला नर्मदा बचाओ आंदोलन पिछले 32 वर्षों से शांति पूर्ण रूप से जारी है। जिनकी आवाज़ को दफन करने के लिए सरकार ने नित नए हथकंडे अपनाए थे। जबकि, पीड़ितों की समस्या, सुविधा पर इतनी रुचि नही दिखाई गई।

जब-जब न्याय की गुहार लगाने पीड़ित लोग जाते थे तो जिम्मेदार कुर्सियां छोड़कर भागते रहते थे। ऐसा क्यों ? क्योंकि, इनके सवालों के जवाब जिम्मेदारों के भृष्ट आचरण के कारण दबे हुए थे। कागज़ पर आदर्श पुनर्वास दिखाने वाले तब सक्रिय हुए जब न्याय पालिका ने डुबाने की तिथि तय कर दी। जबकि, गांव के गांव अपने पुराने स्थल पर ही बसे थे। क्योंकि, पुनर्वास पर तो सड़क, पानी, बिजली की अव्यवस्था ही बनी हुई थी। और दूसरी और भूखंड,मुआवजा की समस्या अलग है।

पूर्व में निर्माण कार्यो में तो जमकर करोड़ो के वारे- न्यारे हुए ही थे। लेकिन, अब ताबड़ तोल व्यवस्था में भी करोड़ो फूक दिए। जिसका सत्यापन किया जाना, जांच की जाना अति आवश्यक है। क्योंकि, पोलो पर स्ट्रीट लाइट में अनियमितता व भृष्टाचार की दुर्गंध आ रही है। और कुछ हद तक सत्यापन या जांच होने की भी खबर है। यह तो सिर्फ स्ट्रीट लाईट का मामला सामने आया। खंगालेंगे तो सड़क व अस्थाई सुविधाओं में भी कुछ न कुछ ही नही, बहुत कुछ मिल सकता है ?

विकास का ढिंढोरा पीटने वाले नोटंकीबाजो ने अधिकारों की बात करने पर पीड़ितों के आंदोलन को दमनचक्र चलाकर नष्ट करने का दुस्साहस किया। केंद्र में बैठे सौदागर के लिए राज्य के उत्साहीलाल ने खुश करने के लिए जन्मदिन के अवसर पर यहां की जनता को डुबोकर गिफ्ट भेंट किया। और प्रधान सेवक लम्बे चौड़े हाथ हिलाकर देश को डेम समर्पित करने की बात कहता रहा। क्या डूब प्रभावित इस देश के नही, जो शासकीय मशनरी का गिरोह के रूप में दुरुपयोग कर, झूठे मुकदमे लादते हुए अत्याचार किया ?

एनव्हीडीए के कु-कर्मो की वजह से निर्दोष पुलिस प्रशासन को सामने कर दिया। वही प्रधान सेवक की तरह ही सरकारी मंशा अनुसार अधिकारी पीड़ितों को जुमले देते रहे। सवाल यह उठता है कि,गलत नीति व आधी-अधूरी कार्य योजना से हुई करोड़ो की बर्बादी का भार सरकारी खजाने को खाली कर जनता क्यों भुगते ? अब भी पुनर्वास की स्थिति जस की तस और समस्या व सुनवाई के अभाव में लोग पुराने आशियाने में ही है। जिसका निराकरण न होने पर पुनः अगले वर्ष बारिस में करोड़ो की बर्बादी करनी पड़ सकती है, तो समय रहते कार्य पूर्ण क्यो नही हो रहा ?

डूब प्रभावितों की आवाज़ दबाकर व करोड़ो रुपया फूंककर भी आदर्श पुनर्वास नही हुआ है। क्या ऐसी ही मंशा थी सरकार की ? राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थ के चलते जिम्मेदार लोग व तानाशाही सरकार ने लोकतंत्र का गला घोंटकर कार्यवाही की थी।इसिलए यह रेवड़ियों की तरह सम्मान पत्र व स्मृति चिन्ह बाँटने का स्टॉल खोल दिया सरकार ने ? पीड़ितों के दिलो में कल्पाट कर, तुम पुरष्कृत करना तो ठीक पर कल्पना करना भी निंदनीय है। फिर भी तुमने तो बाँट दिए क्योंकि, तुम्हारी मंशा पर खरे जो उतरे और इनकी भी मजबूरी ही थी, सरकार हो तुम खिलाफत तो कर नही सकते।

इन हालातों में ऐसे सम्मान-पत्र बाटने से सम्मान का भी अनादर नही होता है क्या ? फुर्सत मिले तो गिरेबां में झांककर एक बार तो कम से कम न्याय संगत दृष्टिकोण अपना लेना सरकार…

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