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गुजरात में खिसकती जमीन से मोदी-शाह भयभीत, साम-दाम-दंड-भेद पर उतारू : दादागिरी व ख़रीद-फ़रोक्त कर सत्ता हथियाने में भिड़े सौदागरों को नरेंद्र पटेल ने किया नंगा_*_सर्व चुनाव एक साथ करवाने वाले 2 राज्यों की तिथि एक साथ घोषित नही कर पाए “पाटीदारों की उपेक्षा पड़ेगी भाजपा को भारी, हार्दिक पटेल ने दिए कांग्रेस समर्थन के संकेत”

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✍🏽सोमेश्वर पाटीदार-प्रधान संपादक👁
📞9589123578

*✒खड़ी कलम…*
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*गुजरात* विधानसभा चुनाव की गर्म लपट राज्य ही नही देश की राजधानी दिल्ली तक पहुँच गई। पिछले दिनों चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश के विधानसभा हेतु निर्वाचन की घोषणा कर दी थी। जबकि, गुजरात चुनाव की घोषणा को लेकर अब तक अटकलें ही लगाई जा रही है।विपक्षी दल कांग्रेस जहाँ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही। वहीं चुनाव आयोग सफाई देते हुए देरी का कारण गिना रहा। लेकिन फिर भी गुजरात में जबरजस्त राजनीतिक उठापठक का दौर जारी है।

चुनाव तो हिमाचल में भी है जिसकी तिथि भी तय हो चुकी। किंतु गुजरात पर पूरे देश की नज़रे टिकी हुई है। क्योंकि यही से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सत्तारूढ़ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दिल्ली तक पहुँचे। इनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न ही नही, इसके अतिरिक्त लोकसभा-2019 की दशा-दिशा भी तय होना है। इसलिए भी मोदी-शाह की नज़र और डगर फिलहाल गुजरात पर ही, है।

सनद रहे अनामत आंदोलन के दौरान पाटीदारों पर भाजपाई सत्ता ने कहर बरपाया था जिसमें कई पाटीदारों की जान चली गई। साथ ही अब तक मांगो पर अडिग हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजराती पटेल-पाटीदार भाजपा को सत्ताहीन कर अपनी ताकत से परिचय कराना चाहते है। गुजरात मे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ही बची है। इसलिए हार्दिक पटेल भाजपा को हरहाल में हराने की मंशा से कांग्रेस को समर्थन का संकेत दे चुके है। उधर दलित-राजपूत समाज मे दखल रखने वाले नेतृत्वकर्ता जिग्नेश व अल्केश अलग भाजपा की नाक में दम कर रहे है।

तमाम विपरीत समीकरणों को अपने पक्ष में करने हेतु भाजपा साम-दाम-दंड-भेद पर उतारू होकर नितनये लॉलीपॉप देकर या निजी जिंदगी में दखल कर या फिर हराम की हरियाली में सुला कर खरीद फरोक्त कर इनके खिलाफ उठने वाले राजनीतिक या सामाजिक नेताओं की आवाज़ को दबाने का दुस्साहस किया जा रहा। हाल ही में, हार्दिक पटेल के सहयोगी नरेंद्र पटेल ने मीडिया में खुलासा किया है कि, उन्हें 1 करोड़ में भाजपा में जाने का सौदा हुआ था। जिसके तौर पर 10 लाख नगद दे भी दिए गए थे। इससे स्पष्ट होता है कि, मोदी-शाह कितने सत्ता खिसकने के भय से डरे हुए है।

सवाल यह है कि, डिजिटल की बात करने वाले लोगों के 10 लाख का हिसाब व लेनदेन मे दोषियो पर कानूनी कार्यवाही होगी क्या ? दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि, जो लोग आर्थिक भार व समय की बर्बादी की बात करते हुए एक साथ विधानसभा व लोकसभा के चुनाव करवाने की पैरवी करते रहते है। फिर हिमाचल प्रदेश व गुजरात चुनाव की तिथि एक साथ घोषित करने में क्यो अक्षम रहे ? दुर्भाग्य है कि, भारत का प्रधानमंत्री वह व्यक्ति है जिसे सोशल मीडिया पर फेंकू कहा जाता है और उसकी प्रमाणिकता इन कारनामो से खुद ही कर रहा है। जिससे पद की भी गरिमा गिरती है। गुजरात में डोलती कुर्सी को टिकाने के लिए घोषणाओं का पिटारा खोल गड्डा भरने के लिए तारीख में लेट लतीफी प्रतीत हो रही।

सवाल यह भी है कि, बरसों गुजरात का मुख्यमंत्री रहा व अब देश का प्रधानमंत्री जिसे विकास मॉडल के रूप में पेश करते है उस राज्य के लिए इतनी छटपटाहट क्यों ? गर तुमने विकास ही किया है तो तुम्हारे विनाश का भय क्यों सता रहा ? क्यों प्रचार-प्रसार में दर्जनों मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसदों व नेताओं का गुजरात में डेरा डलवाकर जनता के धन की मट्टी-पलित कर रहे हो ? क्यों चुनाव सर पर आते ही दिल्ली छोड़ तुम मोदी गुजरात में भागे-भागे आते हो ? क्यों तुम्हारे खिलाफ उठती आवाज़ को अनैतिक तरीके से दबाने का दुस्साहस करते हो ? क्या अबतक गुजरात से लेकर दिल्ली तक तुम विकास नही सौदागरी से बिराजे हो ? जितना दमन व लोकतंत्र की छाती पर खंजर मोदी के आने के बाद घोंपे गए, इतना पहले कभी नही हुआ मोदी ?

खेर, जो भी होना है काल के गर्भ में छुपा है इस वक़्त। लेकिन, इतना जरूर है कि, मोदी-शाह की सांसे जरूर फूल जाएगी व अहंकारियों की औकात भी दिख जाएगी। क्योंकि, गुजरात में कांग्रेस मजबूत हो न हो, पर इस बार वहां के मतदाताओं का मन कठोर दिखाई दे रहा। जिसका परिणाम ज्यादा या कम भुगतना जरूर पड़ेगा। गुजरात में भाजपाई सभा मे कुर्सी उछालने की ही नही, भाजपाइयों के साथ आक्रोशित जनता के द्वारा मारपीट की भी खबरें आना इसकी पुष्टि कर रही है।

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