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छल-कपट पूर्वक एनबीए नेत्री मेधा पाटकर को भेजा जेल__संस्कारवानो के राज में उपवास भी गुनाह, उधर 12 अगस्त को संतो,मुख्यमंत्रियो के साथ माँ नर्मदा की आरती का करेंगे पाखंड_**_10 अनशनकारियों को उठाने के बाद भी अनशन जारी_* _शासन-प्रशासन में एक भी विभीषण नही,जो दमदारी से बोले-आदर्श पुनर्वास नही हुआ ?_ पुलिस फूलसिंह क्यो बन रही ?

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✍🏽सोमेश्वर पाटीदार-प्रधान संपादक👁
📞9589123578

*✒…खड़ी कलम…*
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*राम* के नाम पर अस्तित्व में आने वाली व आदर्श मूल्य व संस्कारों की बात करने वाली भाजपा के कर्मो को देख कर तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय व श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा भी रो रही होगी।उन्होंने सोचा भी नही होगा कि,सत्ता में आने के बाद हमारे अनुयायी इसके इतने नशेड़ी हो जाएंगे कि, संस्कारो के ठीक विपरीत जाकर उपवास को भी गुनाह की श्रेणी में लेकर सत्ता के प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए शासकीय मशनरियो को एक गिरोह की तरह स्तेमाल कर लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी की हत्या ही कर दे। ओर दूसरी तरफ पाखंडी 12 अगस्त को दर्जनभर मुख्यमंत्रियों व सेकड़ो संतो के साथ माँ नर्मदा की आरती करने वाले है। सीधे मुद्दे की बात पर आकर बताना चाहूंगा कि, सरदार सरोवर बांध से प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने हेतु पिछले 32 वर्षों से नर्मदा बचाओ आंदोलन अहिंसक रूप से लड़ाई लड़ रहा। जिसकी नेत्री मेधा पाटकर के नेतृत्व में अपनी मांगों को लेकर शासन-प्रशासन में बैठे लोगों से मिलकर न्याय की बार-बार गुहार लगाई जाती है।फिर भी इनकी बात को नज़र अंदाज़ कर जिम्मेदार स्थान छोड़ देते या मिलते ही नही। सारे प्रयास करने के बाद बात नही बनी तो पिछली 27 जुलाई को मेधा पाटकर सहित 12 लोग धार जिले के चिखलदा में अनशन पर बैठ गए थे। आदर्श पुनर्वास व मुआवजा सहित विसंगतियों को लेकर जारी अनशन को लगातार मिल रहे विपक्षी दलों व सामाजिक संगठनों के समर्थन से भयभीत शिवराज सरकार ने घोषणाओ व चाटुकारो,दलालों से मिलकर निराकरण करने का असफल प्रयास किया था। मोदी के डंडे से भयभीत शिव-सरकार ने साम-दाम-दंड-भेद कर कैसे भी अनशन समाप्त करने की ठान ली। जिसके अनुसार अनशन के 12 दिन हुए थे कि, शांतिपूर्ण तरीके से अनशन पर बैठे लोगों पर शासन-प्रशासन बलपूर्वक टूट पड़ा और डंडे के दम पर खदेड़ने में कई आंदोलनकारियों को घायल किया। डंडों में आलपिन भी होना बताया गया। अनशन स्थल से मेधा पाटकर व साथियो को स्वास्थ्य के बहाने से उठाकर विभिन्न चिकित्सालय में भर्ती किया जाता है। ओर बहुत से लोगो को अनशन स्थल से पुलिस वाहन में भर कर ले जाया गया था। जिसमे एक आदिवासी युवक ने आप बीती बताते हुए कहा कि, मेरे हाथ पर ब्लड निकल आया, ऐसा लगा कि ब्लेड से भी पुलिस द्वारा काटा गया हो साथ ही डंडों से भी आगे पीछे से मारा गया व चौकी पर लाकर नाम-पता लिख छोड़ दिया जबकि इलाज भी नही करवाया। इस बीच प्रशासन ने 2 प्रकरण दर्ज कर 36 के लगभग आंदोलन कारियो के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर एक भाजपा के ही नगर अध्यक्ष धुरजी पाटीदार को उठा कर जेल भेज दिया। वही बॉम्बे हॉस्पिटल इंदौर से छुट्टी मिलते ही धार आ रही मेधा को राऊ के पास गिरफ्तार कर लिया जाता है और जेल भेज दिया जाता है। सवाल यह उठता है कि, अहिंसक आंदोलन कर जायज मांगे लेकर आये तो शासन-प्रशासन के लोगो को फुर्सत नही, अब उसने उपवास कर कोनसा गुनाह कर दिया जो उठाया और अब जेल भी? कागज पर पुनर्वास कर न्यायालय को तो झूठी सरकार गुमराह कर चुकी पर न्यायालय में भी इंसान ही बैठे है क्या उन्हें सरकारी गिरोह का अत्याचार नही दिखाई दे रहा? शासन-प्रशासन में एक भी विभीषण नही जो इस सरकार के आगे दमदारी से खड़ा होकर बोले कि, डूब प्रभावितों का आदर्श पुनर्वास नही हुआ अब तक? ओर समस्त सुविधा दिए जाने तक इन्हें नही हटाये, ऐसा करके हजारों के मौलिक अधिकारों के साथ ही इनकी ही नही मानवता की जलहत्या करना ठीक नही ? भृष्ट एनव्हीडीए व अन्य अधिकारियों के साथ ही सत्ता में बैठे हराम की हरियाली में पलने वालो के लिए पुलिस विभाग क्यो फूलसिंह बन रहा? क्या भृष्ट अधिकारियों व सत्ता के दलालों ने पुनर्वास से हुई हराम की हरियाली की हवा तुमको भी लगा दी? विडंबना तो देखो यारों गुंडे, बदमाश, व आतंकवादी की तो सरकार सेवा-चाकरी करती है और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के साथ अत्याचार… आज माँ नर्मदा की गोद मे रहने वाले हजारों लोग लोकतंत्र में भी सरकार के द्वारा निर्मित किये गए दहशत व भय के वातावरण में जी रहे है। आज़ादी के वक़्त अंग्रेजो से लड़ कर जिन्होंने अपना जीवन अमर कर लिया और अंग्रेजी हुकूमत के किस्से सुनाए जाते है, वैसे ही आज के यह कारनामे कल लोग अपने बच्चो को सुनाएंगे। इतिहास में दर्ज हुआ कि, यह लोकतंत्र नही तानाशाही एकतंत्री सरकार का ठोकतंत्र है।

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