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म.प्र. सरकार का पौधरोपण बना फोटो खिचाओ महाअभियान : कहीं सूखे ही भेजे तो, कहीं समय पर नही पहुँचे पौधे _कंगाल सरकार आकड़ो की बाज़ीगरी के साथ बड़ा रही जनता पर कर्ज_ *_पौधरोपण की हरियाली के पीछे जनता के साथ धोखा ?

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✍🏽सोमेश्वर पाटीदार-प्रधान संपादक👁
📞9589123578

*✒…खड़ी कलम…*
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*पर्यावरण* को दृष्टिगत रखने की बात जनता को जँचाकर म.प्र. की शिवराज सरकार ने गिनीज़ बुक में रिकॉर्डेड पौधरोपण करवाकर नाम दर्ज करने का प्रयास 2 जुलाई को महाअभियान चलाकर किया। जिसके लिए समाचार व विज्ञापन पर भी ख़र्च हुआ। कई लोग इस महाअभियान को पौधरोपण नही फोटो खिचाओ महाअभियान सिद्ध करते हुए फोटो खिंचवाने में व्यस्त रहे, पौधों से ज्यादा फोटो का रिकार्ड जरूर बन गया होगा।निश्चित रूप से पर्यावरण को संरक्षित करने की आवश्यकता व जिम्मेदारी प्रत्येक मानव जाति की है। लेकिन शासन की मंशा पर इसलिए सवाल उठता है कि, जब पौधरोपण ही करना है तो रिकार्ड की क्या आवश्यकता ? रिकार्ड की वजह से एक ही दिन में सही वक्त पर पौधे पहुँचने की भी समस्या आई साथ ही कही स्थानों पर सूखे निर्जीव पौधे ही दे दिए गए। जैसे:-धार जिले की निसरपुर जनपद क्षेत्र के कुछ गांव में सूखे पौधे ही भेज दिए गए, क्या सम्बंधित जनपद सीईओ ओपी शर्मा भेजने के प्रति लापरवाह थे या सिर्फ आकड़ो की बाजीगरी ही कर रहे थे? क्या इस प्रकार के हालात रिकार्ड के चक्कर मे ओर जगह नही बने? नर्मदा सेवा यात्रा व उपवास से उपहास के किसान संदेश यात्रा की तरह यह भी एक कर्जे में डूबी सरकार का शासकीय धन खर्च कर जनता पर भार बढ़ाने वाली नई नोटंकी नही है? कई घोटालों के बाद यह भी एक महा घोटाला तो नही सिद्ध होगा? किये गए पौधरोपण को संरक्षित कर जीवित रखने के कदम शिवराज नाकाफी नही? पिछले आंदोलनों की बदौलत लगे दाग को रिकार्ड के नाम से भावनात्मक रूप से जनता को भावनाओ में बहाकर पौधों की हरियाली में छुपाने का यह एक नया जनता के साथ धोखा तो नही? सही मायने में पर्यावरण के प्रति समर्पित होकर पौधरोपण अभियान चलाते तो शिवराज रिकार्ड के चक्कर मे न पड़ते हुए 6 करोड़ के बजाय कम पौधे लगाते ओर उनके संरक्षित व जीवित रखने हेतु ज्यादा कार्य करते व 1 ही दिन में जिस तरह 10 दिन का भोजन नही करते वैसे ही 1 दिन के बजाय 10 दिन तक यह अभियान चलाया जा सकता था। ताकि समय पर पौधे भी पहुचते ओर सूखे भी न भेजने पड़ते। इसके अतिरिक्त एक सुझाव मन मे आया कि क्या करते और अब भी क्या कर सकते रखो या मत रखो सुझाव यह है कि, किसान कर्ज से मरा जा रहा और गुहार लगा रहा कर्ज माफी की इस पर यह किया जा सकता था कि, इस वर्ष टारगेट देते कर्जदार किसानों को पौधरोपण की एक संख्या निर्धारित कर प्रति कर्जदार को इतने पौधे लगाकर इन्हें संरक्षित करना है, जिसके पश्चात अगले वर्ष कर्ज माफ होगा। साथ ही कर्जमाफी की ग्यारंटी भी देती सरकार। दूसरा यह भी कर सकते है कि, शासकीय कार्यालयों में व स्कूलों में आने व जाने , पानी पीने व शौच के लिए जाने के समय शासकीय सेवक व बालक एक गिलास पानी अवश्य डाले ऐसी सरलता पूर्वक अनिवार्यता के संस्कार देने का संदेश दे। गिनीज़ बुक में नाम दर्ज होने से क्या संरक्षण हेतु राशि मिलेगी या उनकी टीम संरक्षण करने आएगी ? मेरा मानना है दिए गए सुझाव पर जबर्दस्ती न कर प्रेम से किया जाए तो पौधों का निश्चित संरक्षण होगा और हमारा आने वाला कल स्वस्थ और सकुशल होगा। पर अफसोस है कि, म.प्र. की शिवराज सरकार धरातल पर कुछ कर दिखाने के बजाय शासकीय सेवको पर जबरन भार डालते हुए आकड़ो की बाजीगरी के साथ कागज़ पर ही हरियाली दिखाकर नए घोटाले को अंजाम तो नही दे रही?

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