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उपवास: हल नही है नोटंकीबाज शिवराज : 5 के बाद 10 लाख, फिर 1 करोड़ मौत के तूने तय किये सौदागर

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भोपाल।वाह रे… नोटंकीबाज शिवराज… किसानों की मंदसौर में मौत के बाद 5 लाख फिर 10 लाख ओर जब ज्यादा दबाव बना, सत्ता हिलने लगी तो, कुर्सी बचाने के लिए ओर किसानों को दबाने के लिए मौत का सौदा करते हुए 1 करोड़ तक एक झटके में देने की घोषणा कर डाली। कभी तुमने असामाजिक तत्व कहा, कभी तुमने कांग्रेसी कहा ओर भी बहुत कुछ अन्नदाता को कहा। अरे जो भी था तुम्हारे ही प्रदेश की जनता और किसान थे कोई आतंकवादी तो नही थे ना? पर मेरा सवाल है कि, शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान ही तुम ओर तुम्हारी फरदले उन पीड़ितों तक क्यो नही पहुँची? तब तो तुम्हे गरूर था तुम्हारा हर गण सत्ता में मगरूर था। जब प्रेम से बात प्रकट करने पर तुम अकड़बाज तक उनकी आवाज़ नहीं सुनाई दी तब ही तो चिंतित, पीड़ित ओर परेशान किसान पर गोलियों की बौछार होने के बाद किसानों की मौत ने हर किसी को झकझोर दिया तब लगातार उग्रता वाले धमाके हुए ओर तुझे ही नही इनकी आवाज़ भोपाल तो क्या दिल्ली में बैठे जुमलेबाज़ नरेंद्र मोदी तक को कपा दिया। तुमने प्रदेश में इंटरनेट सेवा बन्द कर अफवाह न फैले उसके नाम पर आवाज़ को दबाया लेकिन तुम ओर तुम्हारे मंत्री और अधिकारी तो जिम्मेदार थे फिर गैर-जिम्मेदार बयान देते हुए कभी पुलिस की गोली चली तो कभी पुलिस ने नही चलाई क्यो बार-बार पलटते रहे? ओर साथ ही देश के कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ऐसे हालातो में भी पीड़ितों से मिलने या समस्या के निदान के बजाय रामदेव बाबा के साथ व्यायाम कर रहे थे। अरे हत्यारी सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान इतने पर भी न बनी तो फिर परंपरागत नोटंकी दिखाते हुए अब भोपाल के दशहरा मैदान में कर रहे उपवास… यह नोबत ही नही आती अगर तुम गम्भीरता से तुम्हारे दल्लो से मिलकर आंदोलन स्थगित करने के बजाय सभी से चर्चा करते या आज उपवास करके सभी से मिलना चाहते वैसे ही तब मिल लिए होते जब वक़्त था जो अब नही। अब तो वक़्त गुजर गया उपवास ही निदान नही है शिवराज… यह सिर्फ भावनात्मक रूप से फिर मामू बनाने का एक कपटी का छलावा मात्र है। मुगालते में हो… जो किसान पेड़ पौधों ओर उपज क़ो पिता की तरह सींचता है धूप-छाव, ठंड-पानी 24 घंटे उसको लेकर चिंतित रहता है और तब जाकर देश की अवाम का पेट भरता है बहुत सहा अब नही, बन्द करो नोटंकी अगर दुसरो के दर्द से तड़पने वाला किसान पीड़ा मससुस कर सकता है तो सोच लेना गर किसान बिगड़ गया तो यह तो कुछ नही, पूरा कृषि प्रधान देश की दशा-दिशा बिगड़ जाएगी। सत्ता की मस्ती छोड़ अपनी औकात में रहेंगे तो कुर्सी पर अच्छे हाल… नही तो हाल के साथ हालात भी बदहाल… धरतीपुत्रों से धरती पर बैठकर ही न्यायसंगत हो बात… तब मिलेगी हर समस्या से निजात…

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