Home इंदौर मंदसौर हिंसा ने बढ़ाई मोदी-शाह की चिंता, गुजरात चुनाव में दिखेगा असर

मंदसौर हिंसा ने बढ़ाई मोदी-शाह की चिंता, गुजरात चुनाव में दिखेगा असर

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भोपाल।पहली नजर में मंदसौर गोलीकांड में किसानों की मौत का मामला नजर आता है। इससे पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। पर भारत की पहचान माने जाने वाले किसान की मौत का असर सियासत पर भी दिखना लाजिमी है। सरकारें बदली हैं और कई नेताओं के सियासी भविष्य पर भी असर पड़ा है।

मप्र की जनता मान रही है कि मंदसौर गोलीकांड का असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर जरूर पड़ेगा। भाजपा और कुछ राजनीतिक पंडित ये भी मान रहे हैं कि डेढ़ साल का समय इस घटना को भुलाने और डैमेज कंट्रोल के लिए काफी है। पर इसका दूसरा पहलू ये भी है कि शिवराज सिंह से कहीं ज्यादा इसकी चिंता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को है। खबर भी है कि पीएमओ ने मंदसौर गोलीकांड की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसे एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया के तौर पर भी देखा जा सकता है। असल मायने में पीएम की चिंता मप्र की नहीं बल्कि इस घटना से पूरे देश पर पड़ने वाले असर और खासकर इसी साल अंत में होने वाले गुजरात चुनाव की है। इस तर्क को नकारा भी जा सकता है कि मप्र की घटना का गुजरात से क्या लेना-देना। कहना भी सही है, लेकिन मंदसौर कांड में मरने वाले 6 मृतकों के नाम जब देंखेंगे तो मोदी की चिंता आपको शिवराज सिंह से कहीं ज्यादा नजर आएगी।

अब सवाल उठता है कि किसान मरे हैं। इनके नामों में ऐसा क्या है जो प्रधानमंत्री की चिंता बढ़ा रहा है। कोई हिंदू, मुस्लिम, दलित, आदिवासी तो नहीं है, जिनकी मौत पर सियासत कर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं। यदि ऐसा नहीं तो इन मौतों का असर प्रधानमंत्री के गृह राज्य में क्यों पड़ेगा। जहां 13 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं। सवाल जायज है, लेकिन इसका जबाब भी उतना ही गंभीर है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की चिंता को कई गुना बढ़ा रहा है। क्योंकि जात-पात, धर्म-मजहब से बढ़कर है अन्नदाता की मौत, जिस देश की पहचान वहां के किसानों से हो, उस देश का किसान सरकार की गोली से मर जाए और उसका असर सियासत पर न पड़े। ऐसा सोचना बेमानी होगा। लेकिन जब नाम की बात हो रही है तो नाम होगा तो जाति भी होगी और इस सवाल का जवाब मृतक किसानों की जाति में ही छिपा है। जो 2018 में होने वाले मप्र चुनाव के पहले 2017 के आखिर में होने वाले गुजरात चुनाव पर असर डालेगा।

अब जरा मंदसौर के मृतकों के उन नामों पर गौर किया जाए जो पीएम मोदी और बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चिंता का कारण है। मध्‍यप्रदेश पाटीदार समाज के प्रदेशाध्‍यक्ष महेन्‍द्र पाटीदार के अनुसार मंदसौर में पुलिस की गोली से पाटीदार समाज के चार किसान कन्हैयालाल पाटीदार निवासी चिलोद पिपलिया, बंटी पाटीदार निवासी टकरावद, चैनाराम पाटीदार निवासी नयाखेड़ा,अभिषेक पाटीदार बरखेडापंथ की मौत हुई है। वहीं कई घायल किसानों में भी पाटीदार समाज के लोग हैं, जो अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। इन नामों से साफ जाहिर होता है कि 6 मृतकों में से 4 पाटीदार समाज के हैं। जो देश और प्रदेश में खेती किसानी के मामले में काफी आगे माने जाते हैं। पाटीदार समाज में इस गोलीकांड को लेकर काफी आक्रोश है। पश्चिमी मध्यप्रदेश का ये इलाका राजस्थान और गुजरात से लगा हुआ है। वैसे भी गुजरात का पाटीदार समाज पहले से ही बीजेपी से नाराज चल रहा है और आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत है। पाटीदार समाज की नाराजगी में मंदसौर गोलीकांड ने आग में घी डालने का काम किया है। घटना के तुरंत बाद पटेल आरक्षण आंदोलन की अगुवाई कर रहे गुजरात के हार्दिक पटेल 9 जून को मंदसौर पहुंच रहे हैं। घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए वो पहले ही बोल चुके हैं कि आंदोलनरत किसानों पर गोलीबारी की खबर विचलित कर देने वाली है। जिस सरकार के मुख्यमंत्री ने इतने दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलनरत किसानों से कोई संवाद तक करना जरूरी नहीं समझा, उन पर सीधी गोलीबारी की गयी है।

मंदसौर गोलीकांड का मध्यप्रदेश में होने वाले चुनाव पर पड़ने वाले असर की बात करें तो मध्यप्रदेश में करीब 7 लाख पाटीदार समाज के लोग हैं। मंदसौर और नीमच जहां आंदोलन की आग धधक रही है, वहीं करीब 3 लाख पाटीदार समाज के लोग हैं। जहां तक पाटीदार समाज की बात करें, तो लंबे समय से बीजेपी का वोट बैंक रहा पाटीदार समाज इस घटना से आक्रोशित है। खासकर गोलीकांड के बाद सरकार के रवैये को लेकर पाटीदार समाज में नाराजगी भी है।

गुजरात के 17 फीसदी पाटीदार वोटर बीजेपी को ले डूबेंगे?

वहीं बात करें गुजरात में पाटीदार समाज के प्रभाव की, तो गुजरात में पाटीदार समाज के मतदाताओं की तादात करीब 17 फीसदी है। बीजेपी को गुजरात की सत्ता लगातार दिलाने में पाटीदार समाज का अहम योगदान रहा है। वैसे भी गुजरात में हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदार समाज आरक्षण के लिए आंदोलनरत है और बीजेपी के खिलाफ जा रहा है। अब इस घटना ने और भी नाराजगी बढ़ा दी है। दूसरी तरफ अशोक गहलोत के गुजरात के प्रभारी बनाए जाने के साथ कांग्रेस पाटीदार समाज पर डोरे डालने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। चर्चा है कि गुजरात में कांग्रेस जहां पाटीदारों को रिझाने के लिए सरकार बनने पर 20 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा अपने घोषणापत्र में करने जा रही है। वहीं करीब 20 फीसदी पाटीदार नेताओं को टिकट देने का मन बना रही है। चर्चा तो यहां तक है कि हार्दिक पटेल के साथ अशोक गहलोत की कई दौर में सकारात्मक चर्चा हो गयी है।

हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी साथ ले डूबेंगे!

अब बात करें मोदी और शाह की चिंता बढ़ाने में शिवराज सिंह की नादानी की। देखा जाए तो शिवराज सिंह ने मोदी और अमित शाह के साथ ‘हम तो डूंबेंगे सनम तुमको भी ले डूंबेगे’ की तर्ज पर काम किया। किसान आंदोलन और मंदसौर गोलीकांड में शिवराज सरकार ने शुरूआत से ही बिना गुजरात चुनाव और मप्र चुनाव की चिंता करते हुए लापरवाही की। एक तरफ तो एक जून से आंदोलनरत किसानों को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और सिर्फ आरएसएस समर्थक भारतीय किसान संघ को किसान बताते रहे और आंदोलनरत किसानों की नाराजगी बढ़ती गयी। आंदोलनरत किसानों को किसान न मानकर असामाजिक तत्व कहा। जिससे आंदोलन बढ़ता गया और जब गोली चल गयी, तब भी शिवराजसिंह नहीं जागे। पहले तो उनकी सरकार ने किसानों की मौत के लिए असामाजिक तत्वों को जिम्मेदार ठहराया और आंदोलन को हिंसक बनाने के पीछे कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कांग्रेस को क्रेडिट देने का काम किया। जब उन्हें धीरे-धीरे गंभीरता समझ में आयी तो पहले मरने वाले किसानों को 5 लाख, फिर 10 लाख और फिर एक करोड़ मुआवजा देने का एलान किया। कुल मिलाकर शिवराज सरकार ने पूरे बीजेपी को संकट में डाल दिया है और तीन साल के जश्न मोदी फेस्ट को तो फीका किया ही है, साथ ही गुजरात चुनाव की चिंता को और बढ़ा दिया है।

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